KASHMAKASH

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कश्मकश
सुहाने सफर पर मैं चला संजेये हंसीन सपने

डगर पर साथ लिये अगर मगर अपने

अधरों पर मंद मुस्कान व दिल में कुछ करने की कश्मकश थी,

फिर भी हौसले की करनी मुझे अजमाइस थी।

बीच डगर इक दौराहे पर मैं थोड़ा ठिठका,

इधर जाऊं या उधर पर मन मेरा था अटका,

सविश्वास इक चुनी राह पर बढता चला गया,

धीरे-धीरे असफलता के भय का बादल छंटता चला गया।

पानी है गर मंजिल तो आगे बढते रहना होगा,

कठिनाइयां आयेंगी पर सजग होकर चलते रहना होगा,

आगे बढने से रोके जायेंगे, साथी किन्तु-परन्तु में उलझायेंगे,

पीछे से टांगें खैंची जायेंगी, कदम अपने भी लड़खड़ायेंगे।

उम्र के इस पड़ाव पर आकर सोचता हूं कि गर मैं उस दिन चुनी राह पर न बढा होता,

तो आज भी उसी दौराहे के आस पास कहीं इक बुत सा बना खड़ा होता,

दोस्तो, सफल होने का मुझे तो बस एक ही मंत्र समझ में आता है,

जो सजग होकर चला इक निश्चित राह पर मंजिल वही पाता है ॥