shohar ki vyatha

0
77

मेरी बीबी है बहुत उबाऊ,
ज्यों शनी संग बैठा हो राहू।
भुक्तभोगी जन देवें नसीहत,
क्या-क्या तंत्र- मंत्र करवाऊं॥
मेरी बीबी——————-‘

मैं पूरब वह पश्चिम जाती,
मेरी पंक्तियां उसे नहीं सुहाती।
इक पल गुस्सा दूजे मुस्काती,
बात-बात पर अश्क बहाती।
ऐ खुदा अब तूं ही बता,
इस नाचीज को कैसे समझाऊं॥
मेरी बीबी———————–‘
नजरें उनसे चार हुई जब,
लगती थी वो मुझको कमसिन।
कैसे मैं सबको बतलाऊं,
अब लगती इच्छाधारी नागिन।
दिन में फीकी हंसी निपोरूं,
पूरी रतियां चरण दबाऊं॥
मेरी बीबी——————–‘